फिर लौटेगा, हॉकी का सुनहरा वक्त

भारतीय हॉकी महासंघ का अध्यक्ष बनने पर मुझे लोगों से ढ़ेरों बधाईयां मिल रही हैं, मैं आप सभी को धन्यवाद व्यक्त करता हूं, मुझे पता है कि  भारतीय हॉकी का एक सुनहरा इतिहास रहा है। इसके गौरव से मैं भलीभांति परिचित हूं, और अध्यक्ष के तौर पर मैं इस चुनौती से पूरी तरह से अवगत हूं, मेरे लिए यह एक जिम्मेदारी है…. एक चुनौती है। जिसे पूरा करने के लिए मैं हरसंभव प्रयास करूंगा।

मैं अपने कॉलेज के दिनों में हॉकी खेला करता था। यह खेल मुझे बहुत पसंद है। आज मुझे मौका मिला है कि मैं उन सभी संभावनाओं की तलाश करूं, जिससे भारतीय हॉकी का स्वर्ण युग वापस लाया जा सके।

इस मौक पर मैं आप सभी पाठकों, खासकर युवाओं को भारतीय हॉकी के अतीत से परिचित कराना चाहूंगा, 1928 में भारतीय हॉकी टीम को पहली बार देश से बाहर खेलने का मौका मिला। एमस्टर्डम गेम्स में खेले गए अपने पहले ही मैच में भारतीय हॉकी टीम ने शानदार जीत दर्ज की, और इसके बाद भारत ने एक के बाद एक छह ओलम्पिक में गोल्ड मेडल जीते।

भारत के इस हैरतअंगेज खेल से पूरी दुनिया स्तब्ध थी, ब्रिटेन के अधीन एक देश ने खेल के मैदान पर इतिहास रच दिया था, यह हर भारतीय के दिल की तमन्ना थी, जो खेल के जरिये सामने आई। मेरे हिसाब से हॉकी को राष्ट्रीय खेल का गौरव ही इसलिए मिला, क्योंकि हॉकी महज खेल न होकर राष्ट्रीय भावना का प्रतीक हो गया था। हॉकी ने भारतीयों को जीत का अहसास दिलाया…आजादी से रू-ब-रू कराया।  एक ऐसे राष्ट्र के आजाद होने का आगाज दिलाया जो अपने मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। हॉकी ने अपने दम से भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना भरी और राष्ट्रीय खेल का तमगा हासिल कर लिया।

हॉकी का जिक्र महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद्र के बगैर अधूरा है। हॉकी के मैदान में मेजर ध्यानचंद्र ने जो करिश्मा ओलम्पिक खेलों में दिखाया, वो कल्पना से परे था। ध्यानचंद्र ने अपने खेल के जरिए भारत को विश्वमंच पर सम्मान दिलाया और पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। ध्यानचंद्र के जादू से जर्मनी का तानाशाह हिटलर भी अछूता नहीं रहा। हिटलर मेजर के स्टिकवर्क का कायल था।

मेजर ध्यानचंद्र के लिए कोई भी सम्मान उनके कद से छोटा था। उनकी खेल प्रतिभा प्रशंसा से परे थी। ऐसे में एक सुर से आवाज निकली…जो उनकी पहचान बन गई…  जादूगर, हॉकी का जादूगर…ध्यानचंद्र…

मैं मानता हूं कि समय के साथ बहुत कुछ बदला है, खेलने का तरीका बदल गया है,  नियम बदले गए हैं, मैदान अब घास के नहीं टर्फ के हैं, लेकिन सबकुछ के बाद भी हॉकी के प्रति हम भारतीयों की चाहत नहीं बदली है। करोड़ों भारतीयों की तरह मेरी भी चाहत है कि हॉकी टीम का एक ही लक्ष्य हो, आगामी ओलम्पिक में गोल्ड मेडल…..इसके लिए मैं पूरी तरह से समर्पित हूं…और मैं हर संभव प्रयास करूंगा, जिससे भारतीय हॉकी उस बुलंदियों तक पहुंचे, जिसकी वो हकदार है…गोल्ड मेडल….

जय हिन्द…

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